सोमवार, 5 जनवरी 2009

लेकिन बुद्ध बनना .....


कुछ लम्हें सीप में बंद मोतियाँ,
याद करके आँखों में छलकती मोतियाँ...
गूथ कर इन्हें मुक्ता की माला बना लूँ,
गले में डालकर ह्दय के पास सहेज लूँ।

मन करता है मुक्ताओं को नभ के सितारें बना दूँ,
कभी सोचती हूँ मुट्ठी में बंद कर लूँ..
कभी लगता है रेत पर फैला दूँ,
मुक्त कर दूँ मुक्ताओँ को और बुद्ध बन जाऊँ।

लेकिन बुद्ध बनना .....
रह-रह कर याद आते लम्हों को फिर सीप ....

13 टिप्‍पणियां:

  1. लेकिन बुद्ध बनना .. आसान नहीं हैं ..अच्छे भाव हैं इस में

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  2. कम शब्दो में गहरी बात.. बहुत ही खूबसूरत!

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  3. बहुत बढ़िया ..बहुत ही कम शब्दों में आपने बहुत बात कह दी....

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  4. shruti ji sameer ji ke blog se hote hue aap ke blog tak pahuncha aur ye jan kar hardik khushi hui ki aap jabalpuria hain . ab apke blog par regularly visit karta rahunga . regards .

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  5. मन करता है मुक्ताओं को नभ के सितारें बना दूँ,
    कभी सोचती हूँ मुट्ठी में बंद कर लूँ..
    कभी लगता है रेत पर फैला दूँ,
    मुक्त कर दूँ मुक्ताओँ को और बुद्ध बन जाऊँ।

    लेकिन बुद्ध बनना .....
    रह-रह कर याद आते लम्हों को फिर सीप ....

    बहुत सुंदर रचना , मुझे आपकी कविता की गहरे में डूबने में मजा आया और यही आपकी कविता की सार्थकता है
    आपकी कविता पर ओशो की गहराई की भी प्रभाव दिखा है और वह शुभ है बहुत शुभ है
    मै आपका लिंक अपने ब्लॉग पर दे रहा हूँ

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  6. बुद्ध बनना आसान नहीं ...
    बुद्ध बनना महत्वपूर्ण भी नहीं...
    सुजाता सी सहजता ज्यादा ज़रूरी है...

    शुभकामनाएं...

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  7. बहुत बढ़िया रचना . आज प्रथम बार आपका देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई और सबसे जादा खुशी इस बात की हुई है कि आप जबलपुर से है .
    महेंद्र मिश्रा
    जबलपुर.

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  8. मन करता है मुक्ताओं को नभ के सितारें बना दूँ,
    well composed
    drawing the sketch of thoughts too

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  9. मन करता है मुक्ताओं को नभ के सितारें बना दूँ,
    कभी सोचती हूँ मुट्ठी में बंद कर लूँ..
    कभी लगता है रेत पर फैला दूँ,
    मुक्त कर दूँ मुक्ताओँ को और बुद्ध बन जाऊँ।

    बहुत सुन्‍दर भाव, बहुत सुन्‍दर कविता। बधाई।

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  10. मन को छू लेने वाली रचना..... एक जबरदस्त एग्रेसिव रिपोर्टर के ऐसे मनोभाव प्रेरणादायी हैं।

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